राजस्थान में मुख्य रूप से मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, बागड़ी, शेखावटी, हाड़ौती, मेवाती, वागड़ी, मालवी आदि बोलियां बोली जाती हैं, जो क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हैं।
- राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से मानी जाती है।
- जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने 1912 में अपनी पुस्तक ‘Linguistic Survey of India’ में पहली बार राजस्थानी बोलियों का 5 भागों में वैज्ञानिक वर्गीकरण किया था।
- डॉ. टेसीतोरी के अनुसार राजस्थानी भाषा 12वीं सदी के लगभग अस्तित्व में आ चुकी थी।
- राजस्थान की भाषा के लिए राजस्थानी शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने 1912 में किया था।
- राजस्थानी भाषा दिवस हर साल 21 फरवरी को मनाया जाता है
- राजस्थानी भाषा को पहले मुड़िया (मोड़ी) /मुड़ियावाटी लिपि में लिखा जाता था वर्तमान में राजस्थानी भाषा को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है।
- मुड़िया लिपि का आविष्कार टोडरमल ने किया था।
- डॉ. सीताराम लालस द्वारा राजस्थानी भाषा का’राजस्थानी सबदकोश’ बनाया था। ये राजस्थानी भाषा का सबसे प्रमुख, विस्तृत और महत्वपूर्ण शब्दकोश है, जिसमें लगभग 2.5 लाख से अधिक शब्द शामिल हैं, जो इसे विश्व के बड़े शब्दकोशों में से एक बनाता है।

1. मारवाड़ी :- मारवाड़ी भाषा राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र (पश्चिमी राजस्थान) में बोली जाती है। जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, पाली, नागौर, बालोतरा, जालोर और बीकानेर जिलों में मारवाड़ी भाषा बोली जाती है। मारवाड़ी भाषा राजस्थान के सर्वाधिक क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा है। मारवाड़ी भाषा के साहित्यिक रूप को ‘डिंगल’ कहा जाता है। जैन साहित्य और मीरा के पद मारवाड़ी भाषा में ही हैं। पृथ्वीराज राठौड़ द्वारा रचित पुस्तक ‘बेलि किसन रूक्मणी री’ डिंगल भाषा का ग्रंथ है। थली, ढाटी, देवड़ावाटी आदि मारवाड़ी भाषा की उप-बोलियाँ है।
- (A). थली :- बीकानेर और जैसलमेर के रेतीले ऊँचे भाग (थली क्षेत्र) में थली भाषा बोली जाती है।
- (B). ढाटी :- बाड़मेर और जैसलमेर के सीमावर्ती क्षेत्रों में ढाटी भाषा बोली जाती है।
- (C). गॉडवाड़ी :- जालौर (आहोर तहसील) और पाली के बाली क्षेत्र में बोली जाती है।
- (D). देवड़ावाटी :- सिरोही जिले मे देवड़ावाटी भाषा में बोली जाती है।
2. मेवाड़ी :- मेवाड़ी भाषा, दक्षिणी राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में प्रचलित है, जिसमें उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद और भीलवाड़ा जिले शामिल हैं। कुम्भा के नाटक मेवाड़ी बोली में लिखे गए हैं।
3. ढूंढाड़ी (झाड़शाही) :- ढूंढाड़ी, पूर्वोत्तर राजस्थान के ढूंढाड़ क्षेत्र में बोली जाती है, जैसे जयपुर, सवाई माधोपुर, दौसा, टोंक और सीकर व करौली के कुछ हिस्सों में बोली जाती है। ढूंढाड़ी भाषा राजस्थान में जनसंख्या की दृष्टि सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। दादू दयाल का साहित्य ढूंढाड़ी बोली में है। ढूंढाड़ी में ‘छै’ शब्द का प्रयोग अधिक होता है। ढूँढाड़ी की सबसे अधिक उप-बोलियाँ हैं। तोरावाटी, राजावाटी, चौरासी, नागरचोल, काठेड़ी, जगरोती आदि ढूंढाड़ी भाषा की उप-बोलियाँ हैं।
- (A). तोरावाटी :- जयपुर के उत्तरी भाग और सीकर के नीम का थाना क्षेत्र (काँतली नदी का क्षेत्र) में बोली जाती है। तोरावाटी का संबंध तँवर वंश के शासन वाले क्षेत्र से है।
- (B). राजावाटी :- जयपुर के पूर्वी भाग में बोली जाती है।
- (C). चौरासी :- जयपुर के दक्षिण-पश्चिमी भाग और टोंक के कुछ हिस्सों में बोली जाती है।
- (D). नागरचोल :- मुख्य रूप से टोंक और सवाई माधोपुर के पश्चिमी भाग में बोली जाती है। (
- D). काठेड़ी :- जयपुर के दक्षिणी भाग में बोली जाती है।
- (E). जगरोती :- जगरोती बोली विशेष रूप से करौली जिले में बोली जाती है।
4. हाड़ौती :- दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में, जैसे कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ जिलों में हाड़ौती भाषा बोली जाती है। हाड़ौती सबसे कठिन और स्पष्ट बोली है।सूर्यमल्ल मिश्रण की रचनाएं हाड़ौती भाषा में ही है।
5. मेवाती :- उत्तर-पूर्वी राजस्थान के मेवात क्षेत्र अलवर और भरतपुर जिलों में मेवाती भाषा बोली जाती है। संत लालदासी, संत चरणदासी, दयाबाई और सहजोबाई ने अपने संप्रदाय का साहित्य मेवाती भाषा में लिखा था। अहीरवाटी, नहेड़ा, कठैर मेवाती भाषा की उप-बोलियाँ हैं।
- (A). अहीरवाटी (राठी) :- अलवर की बहरोड़, मुंडावर और जयपुर की कोटपुतली तहसील में अहीरवाटी बोली बोली जाती है। जोधराज का ‘हम्मीर रासो’ अहीरवाटी बोली में है।
- (B). नहेड़ा :- अलवर के दक्षिणी भाग में बोली जाती है
- (C). कठैर :- भरतपुर के क्षेत्रों में बोली जाती है।
6. वागड़ी :– राजस्थान के दक्षिणी जिलों के आदिवासी क्षेत्रों में, जैसे डूंगरपुर और बांसवाड़ा में वागड़ी भाषा बोली जाती है। वागड़ी को ग्रियर्सन ने ‘भीली बोली’ भी कहा जाता है।
7. बागड़ी :- उत्तरी राजस्थान के बागड़ क्षेत्र में, जैसे नोहर-भादरा, अनूपगढ़, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, बीकानेर के उत्तरी भाग और चूरू जिले के कुछ तहसीलों में बागड़ी भाषा बोली जाती है।
8. शेखावटी :- शेखावटी क्षेत्र में, जिसमें चूरू का दक्षिणी भाग, झुंझुनू, नीम का थाना और सीकर जिले में शेखावटी भाषा बोली जाती हैं। शेखावटी भाषा को मारवाड़ी की उपबोली माना जाता है।
9. मालवी :- दक्षिणी राजस्थान के कुछ हिस्सों में, जैसे झालावाड़ और कोटा के आसपास के जिलों में मालवी भाषा बोली जाती है। रांगड़ी और निमाड़ी, सौंथवाड़ी, पाटवी, रतलामी, उमठवादी आदि मालवी की उप-बोलियां हैं। मालवी भाषा मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र से सटे इलाकों में बोली जाती है। मालवी बोली पर मराठी भाषा का प्रभाव दिखता है।
- (A). रांगड़ी :- यह मालवा के राजपूतों की बोली है। यह मारवाड़ी और मालवी का मिश्रण है और सुनने में थोड़ी ‘कर्कश’ लगती है।
- (B). निमाड़ी :- इसे ‘दक्षिणी राजस्थानी’ कहा जाता है।
10. खैराड़ी :- शाहपुरा (भीलवाड़ा) और बूंदी के सीमावर्ती क्षेत्रों में खैराड़ी भाषा बोली जाती है। खैराड़ी बोली मेवाड़ी, ढूँढाड़ी और हाड़ौती भाषाओं का मिश्रण है।
राजस्थान में बहुत सारी भाषा 2 और 2 से अधिक भाषाओं का मिश्रण है।
| बोली का नाम | किनका मिश्रण है |
| रांगड़ी | मारवाड़ी + मालवी |
| खैराड़ी | मेवाड़ी + ढूँढाड़ी + हाड़ौती |
| निमाड़ी | मालवी + भीली + खानदेशी |
| अहीरवाटी | मेवाती + हरियाणवी |
डिंगल (पश्चिमी राजस्थानी) वीर रस प्रधान, कठोर और चारणों द्वारा प्रयुक्त भाषा शैली है, जो पश्चिमी राजस्थान में विकसित हुई, जबकि पिंगल (पूर्वी राजस्थानी) श्रृंगार व भक्ति रस वाली, ब्रजभाषा मिश्रित, मधुर और भाट कवियों द्वारा प्रयुक्त शैली है, जो पूर्वी राजस्थान में प्रचलित थी; संक्षेप में, डिंगल ‘कठोर’ (वीरता) और पिंगल ‘मधुर’ (कोमलता) का प्रतीक है। सूर्यमल मिश्रण की ‘वीर सतसई’ मुख्य रूप से डिंगल भाषा और ‘वंश भास्कर’ पिंगल भाषा में लिखी गई है।
