मई 1917 में रोम (इटली) से बीकानेर के राजा महाराजा गंगा सिंह द्वारा एक विस्तृत पत्र लिखा गया था, जो इतिहास में ‘रोम-नोट’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
‘रोम-नोट’ में बीकानेर नरेश महाराजा गंगा सिंह ने स्वराज्य के प्रश्न पर लिखा था कि, ‘स्वराज देने में विलंब करने से कोई सुप्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। इसके विपरीत स्वराज प्रदान करने के अत्यंत हितकारी परिणाम होंगे तथा असंतोष व आतंक दूर हो जाएंगे। अत: इन बातों को ध्यान में रखते हुए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि, स्वराज्य की घोषणा तत्काल कर देनी चाहिए।
इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ में उन्होंने ब्रिटिश सरकार से भारत में ‘स्वराज’ (स्वशासन) की दिशा में शीघ्र और सहानुभूतिपूर्ण कदम उठाने की अपील की थी। यह पत्र भारत के राजनीतिक हालातों को सुधारने के लिए उनके दूरदर्शी दृष्टिकोण को दर्शाता है
- रोम‑नोट महाराजा गंगा सिंह की दूरदर्शी और राष्ट्रवादी सोच को दर्शाता है।
- यह एक ऐसा ज्ञापन था जिसमें ब्रिटिश शासन के अधीन भारत द्वारा झेली जा रही समस्याओं को उजागर किया गया था।
- महाराजा ने भारत को ‘स्वराज’ (स्वशासन) प्रदान करने के लिए राजाओं की एक परिषद के गठन का सुझाव दिया। यह भारतीय स्वतंत्रता की वकालत करने की दिशा में एक आवश्यक कदम था।
- उन्होंने इंग्लैंड से भारत लौटते समय रोम से ‘भारतीय सचिव’ को रोम-नोट भेजा। यह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की दुर्दशा पर चर्चा करने में उनके सक्रिय दृष्टिकोण को दर्शाता है।
रोम‑नोट की पृष्ठभूमि
- उस समय प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) चल रहा था।
- महाराजा गंगा सिंह ब्रिटिश साम्राज्य के समर्थक थे और युद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार को सैनिक एवं आर्थिक सहायता दी।
- महाराजा गंगा सिंह उस समय लंदन में इम्पीरियल वॉर कैबिनेट की बैठक में शामिल होने के बाद भारत लौट रहे थे। रोम में रुककर उन्होंने यह नोट लिखा और ब्रिटिश सरकार (मॉन्टेग्यू और चेल्म्सफोर्ड) को भेजा।
रोम‑नोट की मुख्य माँगें :– रोम‑नोट में महाराजा गंगा सिंह ने भारत के भविष्य से संबंधित महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए, जिनमें प्रमुख थे:
- 1.भारत को स्वशासन (Self‑Government) अथवा डोमिनियन स्टेटस दिया जाए।
- 2.ब्रिटिश शासन में भारत की केवल परामर्शात्मक भूमिका न होकर वास्तविक सत्ता दी जाए।
- 3.भारतीयों को प्रशासन, सेना और विदेश नीति में अधिक भागीदारी मिले।
- 4.भारतीय राजाओं और जनता के बीच संतुलित प्रतिनिधित्व हो।
- 5.भारत को ब्रिटिश साम्राज्य में समान भागीदार का दर्जा मिले।
