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राजस्थान में झरने – Waterfall in Rajasthan

राजस्थान अपनी ऐतिहासिक धरोहरों और रेगिस्तान के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां कुछ बेहद खूबसूरत झरने भी हैं मुख्यत: चूलिया झरना, मेनाल झरना, भीमलत झरना, दिर झरना, भील बेरी झरना, दमोह झरना, अरणा-जरणा जलप्रपात और पांडुपोल झरना है।

मानसून के दौरान इसकी खूबसूरती देखने लायक होती है। राजस्थान के ज्यादातर झरने बारिश में ही बहते हैं। मानसून के दौरान इसकी खूबसूरती देखने लायक होती है।

भील बेरी झरना – Bheel Beri Waterfall (पाली) :- राजस्थान का सबसे ऊंचा झरना पाली जिले के भगाेड़ा गाँव में स्थित भील बेरी झरना है। यह 182 फीट (55 मीटर) की ऊंचाई से गिरता है। यह झरना पाली और राजसमंद जिले की सीमा पर स्थित है। भील बेरी झरना, टॉडगढ़ रावली वन्यजीव अभयारण्य में स्थित है। भील बेरी जलप्रपात को ‘राजस्थान का दूध सागर’ कहते है, क्योंकि यह झरना इतनी ऊंचाई से गिरता है, तो दूध जैसा प्रतीत होता है।

भीमलत झरना – Bhimlat Waterfall (बूंदी) :- भीमलत जलप्रपात बूंदी जिले में, मांगली नदी पर स्थित है। मांगली नदी, मेज नदी की सहायक नदी है। स्थानीय लोगों का मानना है कि वनवास के दौरान पांडवों की प्यास बुझाने के लिए भीम ने इस झरने का निर्माण किया था.

मेनाल झरना – Menal Waterfall (भीलवाड़ा) :– राजस्थान का दूसरा सबसे ऊंचा झरना भीलवाड़ा जिले में मेनाल नदी पर स्थित मेनाल झरना है, जिसकी ऊँचाई 180 फीट (54 मीटर) है मेनाल झरना को “राजस्थान का मिनी नियाग्रा” कहा जाता है।

गैपरनाथ झरना – Geparnath Waterfall (कोटा) :- गैपरनाथ झरना, राजस्थान के कोटा जिले में रावतभाटा के पास स्थित एक खूबसूरत प्राकृतिक जलप्रपात है।

चूलिया झरना -chuliya Waterfall (रावतभाटा, कोटा) :- चूलिया जलप्रपात की ऊंचाई 18 मीटर (54 फीट) है। यह जलप्रपात चितौड़गढ़ जिले में स्थित राणा प्रताप सागर बांध और भैंसरोडगढ़ के मध्य रावतभाटा में चम्बल नदी पर स्थित है। यह राजस्थान का एक बड़ा और लोकप्रिय जलप्रपात है। रावतभाटा के पास चम्बल नदी अधिक सकरी हो जाती है, जिसे चम्बल घाटी कहते है। इस घाटी की चट्टानों को चुड़ीनुमा आकृति में काटा गया है, जिससे पानी बहकर जलप्रपात का निर्माण करता है, इसलिए इसे चूलिया जलप्रपात कहते है।

पदाझर महादेव झरना (चित्तौड़गढ़) :– पदाझर महादेव झरना, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में रावतभाटा के पास एक शांत और प्राकृतिक जलप्रपात है।

ध्रुधिया झरना (माउंट आबू ) :- धुधिया झरना राजस्थान के सिरोही जिले में, माउंट आबू के पास स्थित है।

दमोह झरना (सरमथुरा, धौलपुर) :– दमोह जलप्रपात राजस्थान के धौलपुर जिले के सरमथुरा गांव से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित एक प्राकृतिक जलप्रपात है। यह जलप्रपात लगभग 100 फीट ऊंचा है

गर्भाजी झरना (अलवर):- गर्भाजी झरना राजस्थान के अलवर जिले में सिलिसेढ़ झील के रास्ते में, अरावली पहाड़ियों के बीच स्थित है।

अरना झरना (जोधपुर) :- अरना झरना राजस्थान के जोधपुर जिले में मोकलावास गाँव के पास, भोगिशैल पहाड़ियों में स्थित है। झरने के पास अरणेश्वर महादेव मंदिर स्थित है अरना-जरना जलप्रपात (Arna Jharna Waterfall) राजस्थान के जोधपुर जिले में स्थित है।

हल्दीघाटी झरना (उदयपुर) :- हल्दीघाटी झरना, राजस्थान के उदयपुर जिले में हल्दीघाटी क्षेत्र में स्थित एक मौसमी जलप्रपात है। पास में महाराणा प्रताप संग्रहालय है।

सीता माता झरना (प्रतापगढ़) :- सीता माता झरना राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में सीता माता वन्यजीव अभयारण्य के भीतर स्थित एक खूबसूरत और पवित्र जलप्रपात है।

दिर झरना (भरतपुर) :- दिर जलप्रपात राजस्थान के भरतपुर जिले के बयाना तहसील के दर्र बरहाना गांव के पास कांकुड़ नदी पर स्थित है।

बरवाड़ा सामोद झरना (जयपुर) :- बरवाड़ा सामोद झरना जयपुर के सामोद के बालाजी मंदिर के पास स्थित है।

हथनी कुंड झरना (आथुणी कुंड) :– हथनी कुंड झरना राजस्थान के जयपुर शहर में नाहरगढ़ दुर्ग के पास स्थित है। हथनी कुंड ही जयपुर के बीच में से बहने वाली द्रव्यवती नदी का उद्गम स्थल था।

  • पांडुपोल जलप्रपात राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का टाइगर रिजर्व के अंदर स्थित है।
  • खो नागौरिया झरना (जगतपुरा झरना) राजस्थान के जयपुर जिले में स्थित है।
  • राजस्थान में पाराशर (Parashar) जलप्रपात (waterfall) अलवर जिले में स्थित है।
  • गढ़मोरा झरना (Garhmora Waterfall) राजस्थान के गंगापुर सिटी में गढ़मोरा गाँव में स्थित है
  • महेश्वरा झरना (maheshwara Waterfall) राजस्थान के करौली जिले में है।
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राजस्थान में रोपवे – Rajasthan me Ropeway

राजस्थान में रोपवे – राजस्थान में पर्यटन को बढ़ावा देने और धार्मिक स्थलों तक पहुंच को आसान बनाने के लिए कई रोपवे संचालित हैं राजस्थान में वर्तमान में 7 रोपवे संचालित हैं और भविष्य में कई और रोपवे प्रस्तावित हैं।

सुंधा माता रोपवे, भीनमाल (जालौर) :- सुंधा माता रोपवे राजस्थान का पहला रोपवे है। यह रोपवे सुंधा माता मंदिर तक पहुंचने के लिए बनाया गया था, जो जालौर जिले के भीनमाल के पास सुंधा पर्वत पर स्थित है।, जिसका उद्घाटन 20 दिसंबर 2006 को हुआ था। इसकी लंबाई लगभग 800 मीटर है। यह रोपवे राजस्थान के पर्यटन और धार्मिक स्थलों को सुगम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

मंशापूर्ण करणी माता रोपवे, उदयपुर :- यह राजस्थान का दूसरा रोपवे है, जिसका उद्घाटन 8 जून 2008 को हुआ था। इसकी लंबाई लगभग 387 मीटर है। यह उदयपुर के प्रसिद्ध करणी माता मंदिर तक पहुंचने के लिए बनाया गया था, जहाँ से पिछोला झील और शहर का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। यह रोपवे उदयपुर में माछला मगरा पहाड़ी पर स्थित मंशापूर्ण करणी माता मंदिर तक जाता है। यह उदयपुर के पर्यटन को बढ़ावा देने और भक्तों को सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।

सावित्री माता रोपवे, पुष्कर (अजमेर) :- यह रोपवे ब्रह्मा जी के मंदिर के पास स्थित सावित्री माता मंदिर तक पहुंचने के लिए बनाया गया था, जो एक रत्नागिरी पहाड़ी पर स्थित है। यह तीसरा रोपवे है, जिसका निर्माण मई 2016 में हुआ था। इसकी लंबाई लगभग 700 मीटर है। सविता देवी का मंदिर पुष्कर में रत्नागिरी पहाड़ी पर स्थित है। पुष्कर में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने और श्रद्धालुओं को पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक आसानी से पहुंचने में मदद करने के लिए इसका निर्माण किया गया। सावित्री माता मंदिर, रत्नागिरी पहाड़ी पर 750 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

सामोद वीर हनुमान मंदिर रोपवे, चौमू (जयपुर) :- यह चौथा रोपवे है, जिसका निर्माण मई 2019 में हुआ था। इसकी लंबाई लगभग 400 मीटर है। सामोद वीर हनुमान मंदिर रोपवे एक मानवरहित स्वचालित रोपवे है यह भक्तों को 1050 सीढ़ियां चढ़ने की बजाय 5 मिनट में मंदिर तक पहुंचने की सुविधा देता है।

खोले के हनुमान मंदिर रोपवे (अन्नपूर्णा रोपवे), जयपुर :- इसका निर्माण सितंबर 2023 में हुआ था। इसकी लंबाई लगभग 436 मीटर है। अन्नपूर्णा माता मंदिर से खोले के हनुमान मंदिर की पहाड़ी पर स्थित वैष्णो माता मंदिर (जयपुर) तक पहुंचने के लिए बनाया गया था। यह रोपवे खोले के हनुमान मंदिर रोपवे राजस्थान का पहला स्वचालित (ऑटोमेटिक) रोपवे है। यह जयपुर में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने और श्रद्धालुओं को खोले के हनुमान जी और वैष्णो माता मंदिर तक पहुंचने में सुविधा प्रदान करने के लिए बनाया गया।

नीमच माता रोपवे, उदयपुर :- इसका निर्माण जनवरी 2024 में हुआ था। इसकी लंबाई लगभग 430 मीटर है। उदयपुर में एक और धार्मिक स्थल को सुगम बनाने के उद्देश्य से इसका उद्घाटन जनवरी 2024 में हुआ।

जीण माता मंदिर रोपवे, रेवासा (सीकर) :- यह राजस्थान का सातवां रोपवे है, जिसका उद्घाटन 10 अप्रैल 2024 को हुआ था। यह रोपवे जीण माता मंदिर से काजल शिखर मंदिर, रेवासा (सीकर) तक पहुंचने के लिए बनाया गया था। यह जीण माता मंदिर में भक्तों की आवाजाही को सुविधाजनक बनाने के लिए शुरू किया गया।

प्रस्तावित/योजनाबद्ध रोपवे:राजस्थान सरकार “पर्वतमाला योजना” के तहत राज्य के 12 जिलों में 16 नए रोपवे बनाने की योजना बना रही है। यह पहल राजस्थान में पर्यटन को बढ़ावा देने और दुर्गम स्थानों तक पहुंच को आसान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

  • 1. आमेर-जयगढ़-नाहरगढ़ रोपवे, जयपुर :- यह 6.5 किलोमीटर लंबा होने वाला है और राजस्थान का सबसे लंबा रोपवे बन सकता है।
  • 2. जोगी महल, सवाई माधोपुर
  • 3. बिजासन माता (इंदरगढ़), बूंदी
  • 4. समई माता, बांसवाड़ा 5
  • . छतरंग मोरी, चित्तौड़गढ़
  • 6. त्रिनेत्र गणेश मंदिर, रणथंभौर, सवाई माधोपुर
  • 7. रामेश्वर महादेव मंदिर, बूंदी
  • 8. चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर
  • 9. रूठी रानी महल से हवामहल, जयसमंद, उदयपुर
  • 10. कुंभलगढ़ किला ,लाखेला, राजसमंद
  • 11. राजसमंद झील के आसपास की पहाड़ियों को जोड़ते हुए
  • 12. सिद्धनाथ महादेव मंदिर, कल्याणा, जोधपुर
  • 13. श्रीगढ गणेश मंदिर, ब्रह्मपुरी, जयपुर
  • 14. भैरव मंदिर, मेहंदीपुर बालाजी, दौसा
  • 15. कृष्णाई माता, रामगढ़, बारां
  • 16. राजा जी का तालाब, तारागढ़ किला, अजमेर

ये रोपवे पर्यटन को बढ़ावा देने और यात्रियों को इन स्थानों तक पहुंचने में सुविधा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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1857 की क्रांति के समय राजस्थान के पॉलिटिकल एजेंट

1857 की क्रांति :- 1857 के विद्रोह के समय भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग थे और 1858 में लॉर्ड कैनिंग भारत के पहले वायसराय भी बने। 1857 का विद्रोह, भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था।

1857 की क्रांति के समय राजस्थान में A.G.G. (एजेंट टू गवर्नर-जनरल) जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस थे. 1857 के विद्रोह के समय, राजपूताना रेजीडेंसी में एजेंट टू गवर्नर-जनरल (एजीजी) जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस थे। 1857 की क्रांति के समय, राजस्थान में A.G.G. (एजेंट टू गवर्नर-जनरल) जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस का कार्यालय अजमेर में स्थित था.

1857 के विद्रोह के समय, राजस्थान की विभिन्न रियासतों में अलग-अलग पॉलिटिकल एजेंट और शासक –

रियासत पॉलिटिकल एजेंट शासक
मेवाड़ (उदयपुर) मेजर शावर्स स्वरूप सिंह
मारवाड़ (जोधपुर) मैक मेसन तख्त सिंह
जयपुर कर्नल ईडन राम सिंह द्वितीय
कोटा मेजर बर्टनमहाराव राम सिंह
भरतपुर मॉरिसनजसवंत सिंह प्रथम
सिरोही जे.डी. हॉल महाराव शिव सिंह
धौलपुरभगवन्त सिंह

1832 में A.G.G. का मुख्यालय अजमेर में स्थापित किया गया था और राजस्थान के पहले एजीजी मिस्टर अब्राहम लॉकेट थे, 1845 में, A.G.G. का मुख्यालय को आबू में स्थानांतरित कर दिया गया था। 1864 में A.G.G. की दो राजधानियाँ, अजमेर (शीतकालीन राजधानी) और आबू (ग्रीष्मकालीन राजधानी) बनाई गई.

15 अक्टूबर 1857 को कोटा में अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन एवं उसके दो पुत्रों आर्थर और फ्रांसिस को क्रांतिकारियों ने मौत के घाट उतार दिया गया था, धनतेरस पर पटाखों की जगह तोप और बंदूकें गूंजी थीं. क्रांतिकारियों ने कोटा के पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन के सिर को शहर में घुमाया। सिर को बाद में तोप से उड़ा दिया।

1857 के विद्रोह के दौरान क्रांतिकारियों की सेना (नेतृत्व ठाकुर कुशाल सिंह) ने जोधपुर पॉलिटिकल एजेंट (अंग्रेज कैप्टन) मैक मेसन का सिर कलम कर आऊवा किले की प्राचीर पर टांग दिया था। 25 जनवरी 1858 को 24 स्वतंत्रता सेनानियों को आऊवा की गलियों में बांध कर तोपों व बंदूकों से ब्रिटिश सेना ने छलनी कर दिया गया।

  • 1857 की क्रांति के समय जयपुर के राजनीतिक एजेंट कर्नल ईडन थे.
  • 1857 की क्रांति के समय कोटा का पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन था।
  • 1857 की क्रांति के समय जोधपुर के राजनीतिक एजेंट मैक मेसन थे।
  • 1857 के विद्रोह के समय सिरोही रियासत का पॉलिटिकल एजेंट जे.डी. हॉल था।
  • 1857 की क्रांति के समय उदयपुर का पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन शावर्स था।

1857 की क्रांति के समय राजस्थान में 6 सैनिक छावनियाँ थीं।

  • 1. नसीराबाद
  • 2. नीमच
  • 3. खेरवाड़ा
  • 4. देवली
  • 5. एरिनपुरा
  • 6. ब्यावर

1857 की क्रांति राजस्थान में सबसे पहले नसीराबाद छावनी (अजमेर) में 28 मई 1857 को हुई थी। खेरवाड़ा और ब्यावर छावनी ने 1857 के विद्रोह में भाग नहीं लिया था।

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राजस्थान के पंच पीर rajasthan ke panch peer

रामदेवजी, पाबूजी, गोगाजी, हड़बूजी और मेहाजी को राजस्थान के पंच पीर कहा जाता है. ये पांच संत या पीर अपने धार्मिक और सामाजिक योगदान के लिए प्रसिद्ध हैं।

पंच पीर को याद करने की ट्रिक :- गोपा मेरा है

  • गो – गोगा जी
  • पा – पाबू जी
  • मे – मेहा जी
  • रा – रामदेव जी
  • है – हड़बू जी

राजस्थान के पंच पीरों के लिए प्रसिद्ध कहावत है:

पाबू, हड़बू, रामदेव, मांगलिया मेहा । पांचों पीर पधारो, गोगा जी जेहा।।

राजस्थान के पांच पीरों में तेजाजी शामिल नहीं हैं। तेजाजी राजस्थान एक लोकप्रिय लोक देवता हैं, लेकिन उन्हें पंच पीरों में नहीं गिना जाता है.

राजस्थान के लोक देवता, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे न केवल आस्था के प्रतीक हैं, बल्कि सामाजिक समरसता, न्याय और लोक कल्याण के लिए भी प्रेरणा स्रोत हैं।

राजस्थान के पंच पीर

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राजस्थान का एकीकरण Rajasthan Ka Ekikaran

राजस्थान के एकीकरण से पूर्व राजस्थान में 19 रियासतें, 3 ठिकाने और केंद्र शासित प्रदेश अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र थे. इन रियासतों को एकीकृत कर एक आधुनिक राज्य राजस्थान का निर्माण किया गया।

राजस्थान की एकीकरण प्रक्रिया 18 मार्च 1948 से शुरू होकर 1 नवंबर 1956 को 7 चरणों में पूरी हुई। राजस्थान के एकीकरण में 8 साल, 7 महीने और 14 दिन लगे थे।

5 जुलाई, 1947 को भारतीय रियासत विभाग का गठन हुआ था। भारतीय रियासत विभाग का प्रमुख सरदार वल्लभभाई पटेल को बनाया गया था और भारतीय रियासत विभाग का प्रशासनिक प्रमुख (सचिव) वी. पी. मेनन को नियुक्त किया गया था एकीकरण की इस प्रक्रिया में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन की अहम भूमिका रही।

राजस्थान एकीकरण के 7 चरण (7 Stages of Integration)

  • 1. पहला चरण: मत्स्य संघ (18 मार्च 1948)
  • 2. दूसरा चरण: राजस्थान संघ (25 मार्च 1948)
  • 3. तीसरा चरण: संयुक्त राजस्थान (18 अप्रैल 1948)
  • 4. चौथा चरण: वृहत राजस्थान (30 मार्च 1949)
  • 5. पांचवां चरण: संयुक्त वृहत राजस्थान (15 मई 1949)
  • 6. छठा चरण: संयुक्त राजस्थान (26 जनवरी 1950)
  • 7. सातवां चरण: पुनर्गठित राजस्थान (1 नवंबर 1956)

प्रथम चरण – 18 मार्च 1948 (मत्स्य संघ)

राजस्थान के एकीकरण का पहला चरण 18 मार्च, 1948 को शुरू हुआ था मत्स्य संघ में अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली रियासतें शामिल कर के बनाया गया था.

शोभाराम कुमावत को मत्स्य संघ का प्रधानमंत्री बनाया गया था. अलवर को मत्स्य संघ की राजधानी बनाया गया था श्री एन.वी. गाडगिल ने लोहारगढ़, भरतपुर में मत्स्य संघ का उद्घाटन किया.

मत्स्य नाम महाभारत काल से जुड़ा है, जो कनहिया लाल माणिक्य लाल मुंशी द्वारा दिया गया था। युगल किशोर चतुर्वेदी को मत्स्य संघ का उपप्रधानमंत्री किसे बनाया गया.

अलवर रियासत ने 15 अगस्त, 1947 को पहला स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया था। महात्मा गांधी की हत्या के मामले में, अलवर रियासत के महाराजा तेज सिंह प्रभाकर पर संदेह जताया गया था। उन पर नाथूराम गोडसे को हथियार उपलब्ध कराने और साजिश में शामिल होने का आरोप था तत्कालीन महाराज तेज सिंह को नजरबंद कर दिल्ली बुला लिया गया।

महात्मा गांधी की हत्या के आरोप, हिंदू महासभा से उनके संबंध, और अलवर में हुई सांप्रदायिक घटनाओं ने महाराजा तेज सिंह की स्थिति को कमजोर कर दिया, जिससे उन्हें मत्स्य संघ का प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया। इसके बजाय, अलवर प्रजामंडल के लोकप्रिय नेता शोभाराम कुमावत को मत्स्य संघ का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया।

द्वितीय चरण – 25 मार्च 1948 (राजस्थान संघ)

राजस्थान के एकीकरण के दूसरा चरण में कोटा, बूंदी, झालावाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, टोंक, शाहपुरा, और किशनगढ़ रियासतें शामिल थी और राजस्थान संघ की राजधानी कोटा को बनाया गया था। राजस्थान संघ का उद्घाटन 25 मार्च, 1948 को कोटा किले में एन.वी. गाडगिल द्वारा किया गया था।

गोकुल लाल असावा को राजस्थान संघ का प्रधानमंत्री बनाया गया था और कोटा के भीम सिंह राजस्थान संघ के राजप्रमुख बनाया गया। बूंदी के बहादुर श्री बहादुर सिंह राजस्थान संघ के उपराजप्रमुख थे।

तृतीय चरण – 18 अप्रैल 1948 (संयुक्त राजस्थान)

राजस्थान के एकीकरण के तीसरे चरण में उदयपुर रियासत (मेवाड़) को राजस्थान संघ में शामिल किया गया, जिसके बाद इसका नाम बदलकर “संयुक्त राज्य राजस्थान” कर दिया गया। माननीय प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने कोटा में संयुक्त राजस्थान का उद्घाटन 18 अप्रैल, 1948 को किया था।

मेवाड़ के भूपाल सिंह को राजप्रमुख चुना गया और कोटा के श्री भीम सिंह को उपराजप्रमुख चुना गया। उदयपुर को संयुक्त राजस्थान राजधानी बनाया गया था

चतुर्थ चरण – 30 मार्च 1949 (वृहद राजस्थान)

राजस्थान के एकीकरण के चौथा चरण में जोधपुर, जयपुर, बीकानेर और जैसलमेर रियासतों को संयुक्त राजस्थान में मिलाया गया था, यह सबसे बड़ा चरण था और इसी दिन राज्य का नाम “राजस्थान”रखा गया। हर वर्ष 30 मार्च को राजस्थान दिवस के रूप में मनाया जाता है , क्योंकि वृहद राजस्थान का उद्घाटन 30 मार्च, 1949 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया था।

सत्यनारायण राव समिति की सिफारिश पर जयपुर को वृहद राजस्थान की राजधानी बनाया गया था. सत्य नारायण राव समिति सिफारिश पर जोधपुर को उच्च न्यायालय, भरतपुर को कृषि, उदयपुर को खनिज विभाग, बीकानेर को शिक्षा विभाग दिया गया। जयपुर के मानसिंह द्वितीय को राजप्रमुख और श्री भीम सिंह को उपराजप्रमुख बनाया गया था. जयपुर के हीरालाल शास्त्री वृहद राजस्थान के प्रधानमंत्री बने ।

पंचम चरण – 15 मई 1949 (संयुक्त वृहत् राजस्थान)

राजस्थान के एकीकरण का पांचवां चरण में मत्स्य संघ को वृहद राजस्थान में मिलाया गया था सरदार वल्लभभाई पटेल ने 15 मई 1949 को संयुक्त वृहत् राजस्थान का उद्घाटन किया। जयपुर संयुक्त वृहत् राजस्थान राज्य की राजधानी थी। मानसिंह द्वितीय राजप्रमुख थे तथा कोटा के श्री भीमसिंह संघ के उपराजप्रमुख थे । हीरालाल शास्त्री संयुक्त वृहत् राजस्थान राज्य के मुख्यमंत्री बने।

षष्ठम चरण – 26 जनवरी 1950(संयुक्त राजस्थान)

संयुक्त राजस्थान 26 जनवरी 1950 को सिरोही क्षेत्र को संयुक्त वृहत् राजस्थान के विलय के साथ अस्तित्व में आया। इस दिन राजस्थान को अपना आधिकारिक नाम मिला और जयपुर को राजधानी बनाया गया। सिरोही रियासत के आबू और देलवाड़ा क्षेत्र को इस विलय से अलग रखा गया था। भारत का नया संविधान लागू हुआ और राजस्थान को एक पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। मानसिंह द्वितीय को संयुक्त राजस्थान राजप्रमुख और श्री हीरालाल शास्त्री राजस्थान का प्रथम मुख्यमंत्री बनाया गया था।

सप्तम चरण – 1 नवंबर 1956(पुनर्गठित राजस्थान)

राजस्थान के एकीकरण का सातवां चरण 1 नवंबर, 1956 को पूरा हुआ। इस चरण में, अजमेर-मेरवाड़ा, आबू रोड, और सुनेल टप्पा को राजस्थान में मिलाया गया, जबकि सिरोंज उप-जिला मध्य प्रदेश को दे दिया गया। पुनर्गठित राजस्थान की राजधानी जयपुर थी ।मोहनलाल सुखाड़िया इस संघ के मुख्यमंत्री थे। राजप्रमुख का पद बदलकर राज्यपाल का पद कर दिया गया। श्री गुरुमुख निहाल सिंह राजस्थान के प्रथम राज्यपाल बने। राजस्थान का वर्तमान स्वरूप इसी चरण में स्थापित हुआ।

रियासतों के शासकों को तोपों की सलामी दी गई और ठिकानों को तोपों की सलामी सम्मान नहीं दिया गया।

राजस्थान में स्वतंत्रता से पहले नीमराणा, लावा और कुशलगढ़ तीन ठिकाने थे.

राजस्थान एकीकरण के समय सबसे अंत में अजमेर – मेवाड़ क्षेत्र शामिल हुआ था.

राजस्थान एकीकरण को स्वीकारने वाली सबसे पहली रियासत बीकानेर थी

बांसवाड़ा के शासक चन्द्रवीर सिंह ने राजस्थान संघ के निर्माण के समय में विलय पत्र हस्ताक्षर करने हुए कहा था कि मैं अपने डेथ वारंट पर हस्ताक्षर कर रहा हूं .

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राजस्थान में रामसर साइट Ramsar sites in rajasthan

राजस्थान में अभी 5 रामसर स्थल हैं: भरतपुर का केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान, सांभर झील, खीचन गांव (फलोदी), मेनार गांव (उदयपुर) और सिलीसेढ़ झील(अलवर)। राजस्थान में मेनार, खींचन और सिलीसेढ़ झील को मिलाकर राजस्थान में अब 5 रामसर साइट हो गई है। सिलीसेढ़ झील राजस्थान की 5वीं रामसर साइट के रूप में घोषित हुई है।

पारिस्थितिक रूप से नाजुक आर्द्रभूमि स्थलों की रक्षा के लिए 1971 में ईरानी शहर रामसर में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था, ताकि दुनिया भर में आर्द्रभूमि के संरक्षण और संरक्षण पर अंतर्राष्ट्रीय सहमति बनाई जा सके। हर साल 2 फ़रवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया जाता है. 

सांभर झील – 1990 में सांभर झील को रामसर साइट घोषित किया गया था।सांभर झील को छह नदियों से पानी मिलता है: मंथा, रूपनगढ़, खारी, खंडेला, मेड़था और सामोद । सांभर झील हजारों प्रवासी फ्लेमिंगो के लिए एक आश्रय स्थल है! सांभर झील, राजस्थान की सबसे बड़ी खारी झील है. यह भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय खारे पानी की झील भी है. यह झील जयपुर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है. 

केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान – अक्टूबर 1981 में केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान को रामसर साइट घोषित किया गया था। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान राजस्थान के भरतपुर में स्थित है.इसे साल 1971 में संरक्षित पक्षी अभयारण्य घोषित किया गया था. केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान साल 1985 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था. • यह गंभीर रूप से लुप्तप्राय साइबेरियाई सारस की बड़ी आबादी के लिए एकमात्र शीतकालीन आश्रय स्थल है

मेनार गांव (उदयपुर) – उदयपुर के मेनार गांव को ‘बर्ड विलेज’ के नाम से जाना जाता है।मेनार वेटलैंड एक मीठे पानी का मानसून वेटलैंड परिसर है। इसमें तीन तालाब हैं – ब्रह्म तालाब, ढांड तालाब और खेरोदा तालाब। वल्लभनगर विधानसभा क्षेत्र में आने वाले मेनार गांव को बर्ड विलेज के नाम से जाना जाता है। यहां 200 से अधिक प्रजातियों के पक्षी आते है। मेनार में संकटग्रस्त सारस क्रेन, ब्लैक नेक्ड स्टॉर्क, वूली नेक्ड स्टॉर्क, फेरूजीनस पोचार्ड, डालमेशियन पेलिकन और ब्लैक टेल्ड गॉडविट आदि की प्रजातियां भी देखी गईं।

जून 2025 में मेनार को रामसर साइट घोषित किया गया था।

उदयपुर का मेनार गांव ‘बारूद की होली’ के लिए प्रसिद्ध है।

खीचन गांव (फलोदी) – सर्दियों में खीचन गांव, प्रवासी पक्षी (कुरजां पक्षी) डेमोइसेल क्रेन्स (Anthropoides virgo) के बड़े शीतकालीन झुंडों की मेजबानी के लिए जाना जाता है जून 2025 में खींचन को रामसर साइट घोषित किया गया था। खीचन वेटलैंड साइट थार रेगिस्तान के उत्तरी भाग में स्थित एक रेगिस्तानी वेटलैंड, रात्री नदी और विजयसागर तालाब के कारण बना है।

सिलीसेढ़ झील(अलवर) :- अलवर की सिलीसेढ़ झील को आर्द्रभूमि कन्वेंशन के तहत रामसर साइट के रूप में 12 दिसंबर 2025 घोषित किया गया है। सिलीसेढ़ झील को 1845 में महाराजा विनय सिंह द्वारा निर्मित किया गया था। ऐतिहासिक सिलीसेढ़ झील का निर्माण अलवर को पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था। सिलीसेढ़ झील राजस्थान की 5वीं रामसर साइट के रूप में घोषित हुई है।

उदयपुर शहर – राजस्थान के उदयपुर और मध्य प्रदेश के इंदौर को यूनेस्को के रामसर सम्मेलन द्वारा वेटलैंड सिटी की सूची में शामिल किया गया है।उदयपुर शहर को जनवरी 2025 रामसर आर्द्रभूमि स्थलों की सूची में जोड़ा गया था। राजस्थान का उदयपुर शहर भारत में झीलों के शहर के रूप में प्रसिद्ध है। यह पाँच प्रमुख आर्द्रभूमि-रंग सागर, पिछोला, दूध तलाई, फतेह सागर और स्वरूप सागर द्वारा घिरा हुआ है।

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राजस्थान पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित मेले

राजस्थान में कई प्रमुख पर्यटन महोत्सव पर्यटन विभाग द्वारा मनाए जाते हैं, जैसे कि आभानेरी उत्सव, मारवाड़ उत्सव, पुष्कर मेला, चंद्रभागा मेला, पुष्कर मेला, मरू महोत्सव (जैसलमेर), हाथी महोत्सव (जयपुर), ऊंट महोत्सव (बीकानेर) और ग्रीष्मकालीन महोत्सव (माउंट आबू) शामिल हैं.

हाथी महोत्सव – हाथी महोत्सव जयपुर में अयोजित किया जाता है इस महोत्सव में सजे-धजे हाथियों, ऊंटों, और घोड़ों का जुलूस निकाला जाता है.

धुलण्डी उत्सव – सम्पूर्ण भारत में होलिका दहन के बाद अगले पूरे दिन धुलण्डी उत्सव (रंगों का त्योहार) मनाया जाता है। यह वसंत की शुरुआत का प्रतीक है। इस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

राजस्थान फैस्टिवल (राजस्थान उत्सव) -‘‘महाराजाओं की भूमि’’ राजस्थान – विविध रंगों से परिपूर्ण और उज्जवल और चटकीला है। राजस्थान अपना स्थापना दिवस बड़े ही दैदीप्यमान और उत्साहित रूप से मनाता है। राजस्थान का स्थापना दिवस हर साल 30 मार्च को मनाया जाता है यह उत्सव राजस्थान सरकार और पर्यटन विभाग के आयोजन से मनाया जाता है. इस उत्सव में राजस्थान की विरासत और कहानियों को याद किया जाता है.

 गणगौर उत्सव – गणगौर उत्सव राजस्थान के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक गणगौर उत्सव है। अलग-अलग तौर-तरीकों से पूरे राजस्थान में इसे मनाया जाता है। “गण” भगवान शिव का एक पर्याय है और “गौरी” या “गौर” देवी पार्वती का, जो स्वर्ग में भगवान शिव की पत्नी /संगिनी हैं। शिव-पार्वती के साथ होने का उत्सव मनाना सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक है। गणगौर की शुरुआत चैत्र महीने के पहले दिन से होती है और 18 दिनों तक मनाया जाता है

मेवाड़ उत्सव – मेवाड़ महोत्सव राजस्थान के उदयपुर में मनाया जाने वाला वार्षिक उत्सव है जो हिंदू महीने चैत्र के दौरान होता है राजस्थान के निवासियों उत्सव बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है और गणगौर के साथ मनाया जाता है

ग्रीष्म उत्सव – माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन माउंट आबू दो दिवसीय रंगारग ग्रीष्म उत्सव समारोह से ठंडक पहुँचाता है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन से आरम्भ होकर यह ग्रीष्म उत्सव पूरे दो दिन राजस्थानी संस्कृति को आत्मसात करता है। वैशाख महीने में बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर मनाया जाता है

तीज उत्सव – हरियाली तीज श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है कजरी तीज भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है, जो आमतौर पर अगस्त/सितंबर में आती है. बूंदी में कजली तीज का विशेष रूप से मनाया जाता है, जिसे बड़ी तीज भी कहा जाता है. राजस्थान में तीज त्यौहार, विशेषकर जयपुर और बूंदी में, एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उत्सव है तीज का त्यौहार, वास्तव में मानसून के कारण उत्पन्न हरियाली, सामाजिक गतिविधियों, अनुष्ठानों और रिवाजों के साथ पक्षियों के आगमन का उल्लास मनाने का त्यौहार है

आभानेरी उत्सव – आभानेरी में स्थित चांद बावड़ी एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है आभानेरी उत्सव राजस्थान के दौसा जिले के आभानेरी गाँव में आयोजित एक दो दिवसीय उत्सव है

दशहरा – राजस्थान का सबसे प्रसिद्ध दशहरा मेला कोटा में लगता है यह राजस्थान का सबसे बड़ा और पुराना दशहरा मेला है. अक्टूबर नवम्बर माह में प्रतिवर्ष नौ दिन नवरात्रों के उपरांत दशहरा के अवसर पर, कोटा दशहरा मेला ग्राउंड में भारत का प्रसिद्व 15 दिवसीय दशहरा मेले का शुभारम्भ होता है।

मारवाड़ उत्सव – मारवाड़ महोत्सव जोधपुर, राजस्थान में मनाया जाता है, पहले मांड महोत्सव के नाम से जाना जाता था. इस महोत्सव का मुख्य आकर्षण राजस्थान के शासकों की रोमांटिक जीवन शैली पर केंद्रित लोक संगीत और नृत्य है.

पुष्कर मेला – पुष्कर मेला जिसे पुष्कर ऊँट मेला भी कहा जाता है राजस्थान के पुष्कर शहर में आयोजित होने वाला वार्षिक बहु-दिवसीय पशुधन और सांस्कृतिक पर्व है। मेला कार्तिक के हिंदू कैलेंडर माह से शुरू होता है और कार्तिक पूर्णिमा पर समाप्त होता है।

मोमासर उत्सव – मोमासर उत्सव, राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में मोमासर गाँव में मनाया जाता है,यह उत्सव मोमासर के स्थानीय निवासियों और जाजम फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया जाता है. मोमासर, बीकानेर के शेखावाटी क्षेत्र का एक आकर्षक गाँव है ‘मोमसर उत्सव’ की नींव वर्ष 2011 में विनोद जोशी ने रखी थी।

चंद्रभागा मेला – चंद्रभागा मेला हर साल राजस्थान के झालरापाटन में, कार्तिक माह (अक्टूबर-नवंबर) में आयोजित होता है, जो चंद्रभागा नदी के सम्मान में लगता है कार्तिक के महीने  में झालावाड़ के झालारपाटन में यह मेला आयोजित किया जाता है।

बूंदी उत्सव – बूंदी उत्सव ,राजस्थान के बूंदी में मनाया जाता है. बूंदी महोत्सव कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) के महीने में मनाया जाता है

मत्स्य महोत्सव – राजस्थान के अलवर शहर में हर साल अलवर महोत्सव का आयोजन किया जाता है.मत्स्य महोत्सव अलवर, राजस्थान में शहर की स्थापना के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य अलवर क्षेत्र में सांस्कृतिक, विरासत और वन्यजीव पर्यटन को बढ़ावा देना है.

कोलायत मेला – कपिल मुनि का मेला कोलायत में कार्तिक पूर्णिमा पर आयोजित होता है। कोलायत का वार्षिक मेला राजस्थान के बीकानेर में आयोजित किया जाता है। इसे कपिल मुनि मेला भी कहा जाता है। कपिल मुनि मेला राजस्थान के बीकानेर जिले में आयोजित किया जाता है। कोलायत झील के तट पर मेले का आयोजन किया जाता है।

कुम्भलगढ़ उत्सव – कुंभलगढ़ महोत्सव राजसमंद जिले में होता है, जो कि ऊबड़-खाबड़ अरावली पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है। यह किला, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल भी है

रणकपुर उत्सव – रणकपुर महोत्सव राजस्थान के पाली जिले में आयोजित एक वार्षिक सांस्कृतिक उत्सव है, जो मारवाड़-गोडवाड़ क्षेत्र की लोक संस्कृति को प्रदर्शित करता है।

शीतकालीन उत्सव – माउंट आबू राजस्थान में, माउंट आबू में वार्षिक शीतकालीन उत्सव मनाया जाता है। माउंट आबू में दिसंबर में आयोजित वार्षिक शीतकालीन समारोह राजस्थान की गौरवमयी संस्कृति और परंपराओं का परिचायक है।

ऊंट उत्सव – बीकानेर में ऊंट महोत्सव अयोजित किया जाता है राजस्थान के बीकानेर शहर में हर साल ऊंट महोत्सव का आयोजन किया जाता है.जनवरी माह में राजस्थान पर्यटन द्वारा आयोजित, उत्सव में ऊंट दौड़, ऊंट दुग्ध, फर काटने के आलेखन /डिजाइन, सर्वश्रेष्ठ नस्ल प्रतियोगिता, ऊंट कलाबाजी और ऊंट सौंदर्य प्रतियोगिताएं शामिल हैं।

उत्सव पतंग उत्सव – पतंग उत्सव, भारत में मकर संक्रांति ( 14 जनवरी) के मौके पर मनाया जाने वाला एक लोकप्रिय त्योहार है.पतंग महोत्सव राजस्थान के लिए एक उमंग भरा उत्सव है। इस अद्भुत त्यौहार पर पूरे राज्य में पतंगें उड़ाई जाती हैं।

नागौर मेला – नागौर मेला भारत का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला है हर वर्ष जनवरी और फरवरी के महीने के बीच आयोजित, नागौर के मवेशी मेले के रूप में लोकप्रिय है इस मेले में करीब 10,000 बैल, ऊंट और घोड़ों का व्यापार होता है। पशुओं को सुंदर ढंग से सजाया जाता है राजस्थान का सबसे बड़ा पशु मेला परबतसर (नागौर) में वीर तेजाजी महाराज की स्मृति में लगता है, जिसे तेजाजी पशु मेला भी कहा जाता है. 

बाणेश्वर मेला – यह मेला माघ शुक्ल पूर्णिमा के दिन डूंगरपुर के बाणेश्वर मंदिर में लगता है. इसे आदिवासियों का कुंभ मेला भी कहा जाता है. यह मेला भगवान शिव को समर्पित है. यह मेला सोम, माही, और जाखम नदियों के संगम पर लगता है. 

मरू महोत्सव ( डैज़र्ट फेस्टिवल ) – मरु महोत्सव राजस्थान के जैसलमेर मैं अयोजित किया जाता है जो की एक एक सांस्कृतिक उत्सव है यह एक चार दिवसीय वार्षिक कार्यक्रम है जो एक रंगीन भव्य जुलूस के साथ शुरू होता है जिसके बाद मिस पोकरण और मिस्टर पोकरण प्रतियोगिताएं होती हैं।कालबेलिया, कच्ची घोड़ी, गैर जैसे क्षेत्रीय लोकनृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं।

जयपुर लिट्रेचर फैस्टिवल (साहित्यिक उत्सव) – इस फ़ेस्टिवल में साहित्य, कला, और संस्कृति पर चर्चा की जाती है. साहित्य की सीमाओं को विस्तार देने के लिए, जयपुर के डिग्गी पैलेस में, प्रसिद्ध जयपुर लिट्रेचर फैस्टिवल मनाया जाता है, जिसमें साहित्यिक परिदृश्य के सर्वोत्तम तथा उत्कृष्ट लेखकों, कवियों तथा कलाकारों को एक छत के नीचे इकट्ठा किया जाता है

उदयपुर वर्ल्ड म्यूजिक फैस्टिवल (विश्व स्तरीय संगीत समारोह) -प्रति वर्ष झीलों का शहर उदयपुर एक अलग ही धुन गुनगुनाता है। उदयपुर शहर ’उदयपुर वर्ल्ड म्यूजिक फैस्टिवल’ के अगले संस्करण की मेज़बानी करने जा रहा है। दुनियां भर के जाने माने विद्धान, कलाकारों को एक जगह इकट्ठा करने का काम ‘‘सहर” नामक संस्था करती है जिनमें बीस से अधिक देशों के लोग जिनमें ईरान, स्पेन, ब्राजील, सेनेगल, इटली और भारत सहित कई अन्य देशों के लोग भी शामिल होते हैं 

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राजस्थान दिवस और राजस्थानी भाषा दिवस

30 मार्च, 1949 को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जयपुर में एक समारोह में ग्रेटर राजस्थान का उद्घाटन किया था । इसलिए हर साल 30 मार्च को राजस्थान दिवस मनाया जाता है। राजस्थानी भाषा दिवस हर साल 21 फ़रवरी को मनाया जाता है

राजस्थानी भाषा दिवस

राजस्थानी भाषा दिवस हर साल 21 फ़रवरी को मनाया जाता है. राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति गुर्जरी अपभ्रंश से हुई है. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री भंवर सिंह भाटी ने 21 फरवरी 2021 को राजस्थानी भाषा दिवस मनाने के लिए सभी राज्य वित्त पोषित विश्वविद्यालयों / निजी विश्वविद्यालयों / सभी कॉलेजों के विभागाध्यक्षों को निर्देश दिया है।

राजस्थानी भाषा का शब्दकोश डॉक्टर सीताराम लालस ने तैयार किया था. वे एक प्रसिद्ध भाषाविद् और कोशकार थे. उन्हें सीता रामजी माड़साब के नाम से भी जाना जाता है.

राजस्थानी भाषा का पहला उपन्यास ‘कनक सुंदर’ है. इसे शिवचंद्र भरतिया ने 1903 ईस्वी में लिखा था

यूनेस्को ने हर साल 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है ताकि मातृभाषा को बढ़ावा दिया जा सके।

प्रदेश में प्रचलित बोलियों की वजह से मूल राजस्थानी भाषा को लेकर कभी एक राय नहीं बन पाई. राज्य में मारवाड़ी भाषा नागौर, पाली, जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर इलाके में बोली जाती है. तो उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ और भीलवाड़ा क्षेत्र में मेवाड़ी का प्रचलन है. इसी तरह बांसवाड़ा और डूंगरपुर का क्षेत्र बागड़ी का है तो जयपुर अंचल के दौसा, टोंक और सीकर में ढूंढाड़ी वहीं कोटा और बूंदी क्षेत्र हाड़ौती का है. जबकि भरतपुर में ब्रज भाषा का जोर है.

भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची भारत की भाषाओं से संबंधित है। इस अनुसूची में 22 भारतीय भाषाओं को शामिल किया गया है। लेकिन इसमें राजस्थानी भाषा को अभी तक शामिल नहीं किया जा है

राजस्थानी भाषा की सबसे पुरानी पुस्तक कुवलयमाला है. जैन मुनि उद्योतन सूरी ने इसे 779 ईस्वी में लिखा था. यह जाबालिपुर (जालोर, राजस्थान) में लिखी गई थी. इस किताब में राजस्थानी भाषा को ‘मरुभाषा’ कहा गया है.

राजस्थान दिवस

राजस्थान दिवस हर साल 30 मार्च को मनाया जाता है.राजस्थान को पहले राजपूताना के नाम से जाना जाता था और 30 मार्च 1949 को इसे अस्तित्व में लाया गया और 30 मार्च, 1949 को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जयपुर में एक समारोह में ग्रेटर राजस्थान का उद्घाटन किया था । इसलिए हर साल 30 मार्च को राजस्थान दिवस मनाया जाता है।

राजस्थान शब्द का अर्थ है: ‘राजाओं का स्थान’ क्योंकि यहां राजपूतों ने बहुत समय तक राज किया था इसलिए राजस्थान को राजपूताना कहा जाता था।

राजस्थान स्थापना दिवस

1 नवम्बर को राजस्थान स्थापना दिवस मनाया जाता है । क्योकि 1 नवंबर, 1956 को राजस्थान के निर्माण का काम पूरा हुआ था राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया 18 मार्च, 1948 को शुरू हुई थी. यह प्रक्रिया सात चरणों में 01 नवंबर 1956 को पूरी हुई थी. इस दिन राजप्रमुख का पद खत्म हो गया और राज्यपाल का पद बना.

निरोगी राजस्थान दिवस

17 दिसम्बर को ”निरोगी राजस्थान दिवस” मनाया जायेगा। राजस्थान में निरोगी राजस्थान अभियान की शुरुआत 18 दिसंबर, 2019 को हुई थी. इस अभियान के ज़रिए प्रदेश में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा रही है.

कर्नल जेम्स टॉड को राजस्थान के इतिहास का जनक कहा जाता है. वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी और ओरिएंटल विद्वान थे. उन्होंने भारत के इतिहास और भूगोल पर कई रचनाएं लिखीं.

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राजस्थान की प्रमुख छतरियां (Rajasthan ki chhatriya)

राजस्थान अपने महलों, किले और छतरियों के लिए भारत ही नहीं दुनिया में प्रसीद है गेटोर की छतरियां, 32 खंभो की छतरी, 80 खंभो की छतरी (मूसी महारानी), 80 खंभो की छतरी, क्षारबाग की छतरियाँ, केसरबाग की छतरियाँ, बङा बाग की छतरियाँ, देवीकुंड सागर छतरियाँ आदि प्रमुख छतरियां हैं।

गैटोर की छतरियां – नाहरगढ़ दुर्ग की तलहटी में बनी गैटोर की छतरियां जयपुर कछवाहा शासकों का निजी श्मशान घाट है। जिसमें सवाई जयसिंह द्वितीय से लेकर महाराजा सवाई माधोसिंह तक के राजाओं की छतरियां है।

ईश्वरी सिंह की छतरी यहा पर स्थित नहीं है। इनकी छतरी सिटी पैलेस (जयपुर) में स्थित है। सवाई ईश्वरी सिंह की छतरी का निर्माण सवाई माधोसिंह के शासन काल में किया गया था आमेर के राजा मानसिंह प्रथम की छतरी आमेर के पास हाड़ीपुरी गांव में है। जिसकी स्थापत्य कला कोलायत में साधु गिरिधापति की छतरी के समान है।

गुसाईयों की छतरियां विराटनगर ( जयपुर ) में स्थित है।

84 खंभों की छतरी –इस छतरी का निर्माण 1683 ईस्वी में महाराव अनिरुद्ध सिंह ने धाबाई देवा गुर्जर की स्मृति में देवपुरा गांव (बूंदी) में करवाया था। इस छतरी में कामसूत्र के 84 आसनों को दर्शाया गया है।

80 खंभों की छतरी – अलवर दुर्ग के पास बनी 80 खंभों की मूसी महारानी की छतरी है। जिसका निर्माण 1815 में महाराजा विनयसिंह ने करवाया था। जो महाराणा बख्तावर सिंह की पासवान रानी थी। यह रानी बख्तावर सिंह की मत्यु पर सती हुवी थी। यह छतरी दो मंजिला है जिस पर महाभारत और रामायण के भित्ति चित्र है। छतरी का नीचला भाग लाल बालू पत्थर से बना है। जिसकी संरचना हाथी के समान है।

बड़ा बाग की छतरियां – बड़ा बाग की छतरियां राजस्थान के जैसलमेर में स्तिथ हैं, जो की जैसलमेर के राज परिवार का शाही शमशान घाट है बड़ा बाग का निर्माण महाराजा जय सिंह द्वितीय के उत्तराधिकारी लूणकरन ने किया था. छतरियां बनाने का अधिकार शाही परिवार के देहवासी राजा के पोते का होता है। जवाहर सिंह और गिरधर सिंह महाराज की छतरियां अभी पूर्ण नही हो पाई, भारतीय स्वतंत्रता के बाद पूरी नहीं हो पायी।

क्षारबाग की छतरियां कोटा में स्थित है। क्षारबाग मैं कोटा के हाड़ा शासकों की छतरियां स्थित है।

देवकुण्ड की छतरियां देवीकुंड सागर, बीकानेर में स्थित है। देवकुण्ड की छतरियां बीकानेर राजघराने का श्मशान घाट हैं. यहां पर राव बीका व रायसिंह की छतरियां प्रसिद्ध है।

जोधपुर की रानियों की छतरियां पंचकुंड (मंडोर, जोधपुर) में स्थित है। यहाँ पर कुल 49 छतरियां, जिनमें रानी सूर्यकंवरी की छत्री 32 स्तंभों पर स्थित सबसे बड़ी छतरी है।

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की 8 खम्भों की छतरी, बाण्डोली (चावंड, उदयपुर) में बनी है। इसका निर्माण अमरसिंह प्रथम ने करवाया था।

छात्र विलास की छतरी कोटा में स्थित है।

केसर बाग की छतरी बूंदी में स्थित है।

जसवंत थड़ा-  यह छतरी जोधपुर में स्थित है। इसका निर्माण सरदार सिंह ने करवाया था।

संत रैदास (रविदास) की छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग में है यह आठ खंभों पर बनी है

गोपाल सिंह यादव की छतरी करौली में स्थित है।

मांडल गढ (भीलवाड़ा) में स्थित 32 खम्भों की छतरी का संबंध जगन्नाथ कच्छवाहा की छतरी है।

रणथम्भौर (सवाई माधोपुर) में स्थित 32 खम्भों की छतरी हम्मीर देव चैहान की छतरी है

नागौर दुर्ग में अमरसिंह राठौड़ की 16 खम्भों की छतरी बनी हुई है यह छतरी, नागौर के शूरवीर राजा अमर सिंह राठौड़ और उनके वंशजों की है

मामा भांजा की छतरी मेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर) में स्थित है ये धन्ना गहलोत और भीयां चौहान नामक वीरों की छतरी है, जो आपस में मामा-भान्जा थे। महाराजा अजीतसिंह ने इस 10 खम्भों की छतरी का निर्माण मेहरानगढ़ दुर्ग में लोहापोल के पास करवाया था।

पृथ्वीराज सिसोदिया की 12 खंबो की छतरी कुंभलगढ़ किले में स्थित है। पृथ्वीराज सिसोदिया को उड़ना राजकुमार भी कहा जाता है इसे न्याय की छतरी के नाम से भी जाना जाता है

टंहला की छतरीयां अलवर में स्थित हैं।

आहड़ की छतरियां उदयपुर में स्थित हैं इन्हे महासतियां भी कहते है। सिसोदिया राणाओं की छतरियाँ आहड़ , उदयपुर में स्थित है।

राजा जोधसिंह की छतरी बदनौर (भीलवाडा) में स्थित है।

एक खंभे की छतरी, रणथंभौर (सवाई माधोपुर) में स्थित है।

6 खम्भों की छतरी लालसौट (दौसा) में स्थित है। इसे बंजारे की छतरी कहा जाता है

गोराधाय की छतरी जोधपुर में स्थित हैं। ये अजीत सिंह की धाय मां की छतरी है। ये 6 खम्भों की छतरी है।

जयमल (जैमल) व कल्ला राठौड़ की छतरियाँ चित्तौड़गढ में स्थित है। जयमल और कल्लाजी की छतरी जब आप चित्तौड़गढ़ दुर्ग में प्रवेश करते है तो दुर्ग के हनुमान पोल और भैरव पोल के मध्य दो छतरिया बनी हुई है जिसमे चार स्तम्भो वाली छतरी कल्लाजी की है और छह स्तम्भो वाली छतरी जयमलजी की है।

चार खंभों की छतरी (श्रृंगार कंवरी) चित्तौड़ दुर्ग में स्थित है इसे राणा कुंभा ने बनवाया था.

राणा सांगा की छतरी माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा) में स्थित है।यह छतरी संगमरमर से बनी है और इसमें 32 खंभे हैं

रणथम्भोर अभयारण्य में कुक्कुर घाटी में कुत्ते की छतरी स्थित है ।

अलवर में नैहड़ा की छतरी स्थित है।

चेतक की छतरी वलीचा गाँव (राजसमंद) में स्थित हैं।

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राजस्थान के प्रमुख अनुसंधान केन्द्र (Major Research Centers of Rajasthan)

राजस्थान में अनुसंधान केंद्र (List of Research Centers in rajasthan in Hindi) प्रौद्योगिकी, विज्ञान, कृषि, सांस्कृतिक, अर्थव्यवस्था,चिकित्सा और सामाजिक विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित है।

1. केन्द्रिय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) (Central Arid zone Research Institute) की स्थापना 1959 में जोधपुर मैं मरुस्थलीकरण के विस्तार को रोकने के लिए स्थापना की गई। 1952 में मरू वनीकरण केन्द्र की स्थापना जोधपुर में की गई। जिसका बाद में विस्तार 1957 में मरू वनीकरण एवं मृदा संरक्षण केन्द्र के रूप में हुआ तथा अन्ततः भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के अधीन इसे केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के रूप में 1959 में पूर्ण संस्थान का दर्जा दिया गया।

2. शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (आफरी)  (Arid forest Research institute) की स्थापना जोधपुर ,राजस्थान में 1988 ई.में की गई थी. संस्थान देश के शुष्क क्षेत्रों में खेती की समस्याओं का समाधान खोजने के लिए बहु-विषयक अनुसंधान करता है भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद देहरादुन (ICFRE) के आठ संस्थानो में से एक है।

3. केन्द्रिय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान की स्थापना  1962 ई. में  अविकानगर (टोक) मैं की गई थी ,मुख्य उद्देश्य भेड़ एवं खरगोश उत्पादन प्रशिक्षण एवं अनुसंधान करना है.

4. केन्द्रिय बकरी अनुसंधान संस्थान – केन्द्रीय बकरी अनुसंधान केन्द्र अविकानगर, टोंक में स्थित है और स्थापना  1962 ई. में हुई थी. बकरी विकास एवं चारागाह उत्पादन परियोजना रामसर ,अजमेर में स्विट्‌जरलैण्ड के सहयोग से चलाई जा रही है

5. भेड़ एवं ऊन प्रशिक्षण संस्थान – जयपुर

6. केन्द्रिय ऊन विकास बोर्ड – जोधपुर

7. भेड़ रोग अनुसंधान प्रयोगशाला – जोधपुर

8. राजस्थान में NBPGR का प्रादेशिक केन्द्र  – जोधपुर में राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) का क्षेत्रीय स्टेशन साल 1976 में स्थापित किया गया था.

9. राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र – यह राजस्थान के भरतपुर के सेवर में अवस्थित है। इसकी स्थापना 20 अक्टूबर 1993 को हुई थी।

10. राष्ट्रीय मसाला बीज अनुसंधान केन्द्र – तबीजी, अजमेर

11. राजस्थान कुक्कुट अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान :-  कुक्कुट प्रशिक्षण संस्थान अजमेर, राजस्थान में स्थित है। राज्य का एकमात्र कुक्कुट प्रशिक्षण संस्थान है

12. केन्द्रिय कृषि अनुसंधान केन्द्र – दुर्गापुरा, जयपुर ( स्थापना – 1943 में)

13. केन्द्रिय कृषि फार्म – सुरतगढ़ (गंगानगर) मैं स्थापना 15 अगस्त 1956 को रुस की सहायता से स्थापित कि गी थी। इसे एशिया का सबसे बड़ा कृषि फार्म माना जाता है

14. केन्द्रिय कृषि फार्म -2  :- जैतसर, गंगानगर कनाड़ा की सहायता से स्थापित किया गया था ।

15. केन्द्रिय शुष्क बागबानी संस्थान -केन्द्रिय शुष्क बागबानी संस्थान राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित है।यह संस्थान 1993 से बागवानी फल एवं सब्जी के अनुसंधान एवं विकास कार्य में लगी हुई है।

16. बेर एवं खजुर अनुसंधान केन्द्र  बीकानेर में स्थित है।जिसकी स्थापना 1978 ई. में ।

17. बैल पालन केन्द्र नागौर में स्थित है।

18. केन्द्रिय ऊन विश्लेषण प्रयोगशाला – बीकानेर (स्थापना – 1965)

19.  भेड़ प्रजनन केन्द्र फतेहपुर, सीकर में स्थित है।1973 ई. भेड़ की “मेरिनो नश्ल ” यहीं से तैयार की जाती है |

20. अश्व प्रजनन केन्द्र :- राष्ट्रीय अश्व (equines) अनुसंधान केन्द्र बीकानेर में स्थित है। इस परिसर की स्थापना 28 सितंबर 1989 को अश्व के उत्पादन की क्षमता के अनुकूलन के लिए प्रौद्योगिकियों में सुधार हेतु अनुसंधान करने के लिए की गई थी।

21. राष्ट्रीय ऊँट अनुसंधान केन्द्र – राष्ट्रीय ऊँट अनुसंधान केंद्र जोहड़बीड,बीकानेर में स्थित है।

22.कपास अनुसंधान केन्द्र श्री गंगानगर में स्थित है

23. केंद्रिय पशुधन प्रजनन फार्म  सुरतगढ़ (गंगानगर) में स्थित है

24. चारा बीज उत्पादन फार्म मोहनगढ़ (जैसलमेर) में स्थित है

25. बाजरा अनुसंधान केन्द्र बाड़मेर में स्थित है

26. ज्वार (सोरधम) अनुसंधान केन्द्र वल्लभनगर (उदयपुर) में स्थित है

27. चावल अनुसंधान केन्द्र बाँसवाड़ा में स्थित है

28. मक्का अनुसंधान केन्द्र – किसानों को कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में नवीनतम तकनीकी ज्ञान अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। मक्का अनुसंधान केन्द्र की स्थापना 1 अप्रैल, 1983 को बोरवट गाँव ,बाँसवाड़ा में की गई थी

29.  राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (RSCERT)- राजस्थान सरकार द्वारा गठित महरोत्रा समिति की सिफारिश के अनुसार विद्यालयी शिक्षा के क्षेत्र में गुणात्मक उन्नयन के लिए 11 नवंबर 1978 को उदयपुर में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, राजस्थान (एसआईईआरटी) की स्थापना की गई थी

30. मणिक्या लाल वर्मा आदिवासी अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान भारत के राजस्थान राज्य (प्रांत) के उदयपुर में स्थित है।

31. राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण ब्यूरो का प. द क्षेत्रिय केन्द्र  उदयपुर में स्थित है.

32. भैंस प्रजनन केन्द्र , वल्लभनगर (उदयपुर) में स्थित है

33. भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण पश्चिमी क्षेत्र केन्द्र, उदयपुर में स्थित है

34. भारतीय मौसम विभाग की वेधशाला ,जयपुर में स्थित है

35. राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान ,जयपुर में स्थित है

36. केन्द्रिय इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग शोध संस्थान (सीरी), पिलानी (झुंझुनु) में स्थित है

37. राष्ट्रीय शूकर फॉर्म (सुअर) अलवर में स्थित है

38. सिरेमिक विद्युत अनुसंधान एवं विकास केन्द्र (CERDC) बीकानेर में स्थित है.

39. पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर- (West Zone Cultural Centre (WZCC) Udaipur) में स्थित है

40. रक्षा प्रयोगशाला (Defence Laboratory) जोधपुर में स्थित है

41. राजस्थान इंस्टीट्यूट ऑफ टूरिज्म एंड ट्रैवल मैनजमेंट (RITTMAN) जयपुर में स्थित है